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हरि बोल रे

क्यों ,मेरे सपनों पर पहरा,

 क्यों मैं हूं कमजोर रे ,

हरि बोल रे।

 काया की माया ढोती ,

हर बार खड़ी,  बेबस तकती,

मैं किस दर में छुप जाऊं रे।

 हरि बोल रे ।

मैं क्या पहनूं ,मैं कैसे चलूं,

मैं क्या बोलूं,क्या ना बोलूं,

यह मान मेरा,अपमान मेरा,

क्यों जग से कतराऊं  रे ,

हरि बोल रे ।

नारी का आभूषण लज्जा,

 है ,श्रृंगार व्यवहार ,

यह सोच, समझ 

क्यों आप बुझा दूं ,

हाथों की मशाल रे।

 हरी बोल रे।

Comments

  1. बहुत सुंदर रचना 👌👌

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